गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013


 !! मातृ-पितृ दिवस पर !! 


माता-पिता के प्रति - 


                     -श्यामलाल उपाध्याय 


माता-पिता न भूलना, चाहे जग संसार ।
अगणित जो उपकार हैं, कभी न पाना पार ।।

पूजे देवी देवता, पूजी ऊंची भूम ।
तब तुझ सी मूरत मिली, नहीं अघाती चूम ।।

मातु-पिता के मन कहीं, कभी न जाना तोड़ ।
जग के सिरजनहार से, कभी न तू मुख मोड़ ।।

कण-कण ले मुख में दिये, बड़ा किया सो जान ।
अमृतदाता को कहीं, कभी न विष का दान ।।

लाड़ प्यार तुझसे किए, पूरी तेरी चाह ।
ऐसे स्नेही से कभी, सदा बनेगी राह ।।

चाहे कितने काम से, मिले जो कोटि हजार ।
अरब-खरब सब व्यर्थ हैं, पाई तूने हार ।।

तेरे भींगे स्थान पर, सोई कितने वर्ष ।
उसे और क्या चाहिए, पाया केवल हर्ष ।।

ऐसे स्नेहिल नेत्र हैं, आंसू से हों दूर ।
करना उसका है कभी, कहीं मनोरथ पूर ।

जिसने फूल बिछा दिए, स्नेहिल पाई राह ।
कभी न ऐसे प्रेम को, हो काटों की चाह ।।

धन दौलत देते सभी, कभी नहीं पितु-मात ।
परमपूज्य इनके चरण, कभी न करना घात ।।

सन्तति से सेवा कहीं, हों सन्तति सम भाव ।
जैसी करनी कर चला, होगी वैसी चाव ।।

-दोहा दर्पण से

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013


चिड़िया रैन बसेरा !


तिनके-तिनके जोड़े, कितने, कितनी ईंटें बालू ;
कितने दिन का था, यह डेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

कितने-कितने खून बहाये, दौलत के अम्बार लगाए ;
क्षण में टूट गया, वह बेड़ा, चिड़िया रैन बसेरा ।

कितने बने सिकन्दर आए, बड़े लुटेरे ही कहलाये ;
देख लिया, इस जग का मेला, चिड़िया रैन बसेरा ।

ईसा हों या मूसा प्यारे, राम, कृष्ण, जिन, बुद्ध हमारे ;
छोड़ गये, अपना क्या हेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

कैसा, यह संसार बनाया, इसमें क्या न यहां उपजाया ;
चार दिनों का था, यह घेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

मुट्ठी बांध सभी थे, आए, बहुत किया, पर, कितना पाये ;
कल का पाया, नहीं, सवेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

कल ही मुकुट बंधा था, प्यारे, हाथ हुए, हल्दी के न्यारे ;
सिन्दूर मिटा गया, वह फेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

कहां गये, वे अनुभव सारे, कल पर तुमने सब कुछ वारे ;
चार दिनों का गया, सवेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

तुम तो बल विवेक थे, पाए, कभी न मन में इनको लाये ;
बाजी हारी, क्या हिय हेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

जी लो, बस निज कर्म सहारे, जीवन में तुम सब कुछ हारे ;
रही, सोच, मेरा, क्यों तेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

-नियति निक्षेप

शनिवार, 5 जनवरी 2013


विडम्बना 

शमित, भस्मि जौहर की, कितनी शताब्दियों से ।
तथापि, सतियों में निरन्तर आस्था,
घोर अवहेला सावित्रियों की
जिनकी तुषाग्नि सुबक रही, अक्षुण्ण
असंख्य अबलाओं के क्रन्दन में, बन भर्त्सना बारूद ।

हे धर्म धुरीन ! अपनी ड्योढ़ी देख
जहां दे रखा है, आज भी आजीवन कारावास
बर्बरता की लौह-श्रृंखला, जर्जरित अनुशासन,
विगलित प्रवंचना,
पाशविकता, लुण्ठन, जल्पना, अवगुण्ठन ।
ये ही तेरे अवदान- कितने हेय, हास्यास्पद, निष्करुण ।

तेरा यह म्लान आवास स्वयं में एक अपंग देवराला,
जहां सहस्त्र देवरालों के, रुपकुमारियों के
जघन्य, कुत्सित, वीभत्स नृत्य, पर, दृष्टि का सर्वथा अभाव ।
गान्धारी, धृतराष्ट अथवा सुयोधन ।
सभी आचारसम्मत संज्ञायें विलुप्त, फिर, तू निरुत्तर क्यों ?
तेरी ये वधुएं, विधवाएं, कुमारिकाएं ।

यश-मान तेरे सहचर, लांछना हमारी संगिनि,
हास को हताशा, रुदन को अगाध अश्रु,
मुक्ति-कामना स्वप्न ।
मैं नारी, अबला, सावित्री कालान्तर से,
कातर, निरुपाय, पीड़ित, प्रताड़ित, मर्दित-घर्षित ।

                                             --नियति निक्षेप

गुरुवार, 3 जनवरी 2013



अबलाओं की पुकार 
-प्रो. श्यामलाल उपाध्याय 

बहन-बेटियां बिलख रहीं हैं, भरी नींद सो रहा देश । 
भय-कातर ललनायें टूटीं, यह तुम तक संदेश ।। 

समय आ गया, अब संसद को, आर्तनाद सुनना होगा । 
द्रौपदियों को विपदाओं से, मुक्त उन्हें करना होगा ।। 

बचा नहीं सकते तो ले लो, रहा चूड़ियों का उपहार । 
सत्ता में तुम रह न सकोगे, हुई तुम्हारी कर्कश हार ।।

दुःशासन हैं शासन करते, सता-सताकर देते ताप ।
दामिनियां कड़केंगी ऊपर, सह लेना उनके परिताप ।। 

अबलायें सबलायें होंगी, आग उगलनेवाली । 
नारी जग के आर्तनाद से, भस्मि शिखा बलने वाली ।। 

बुधवार, 19 दिसंबर 2012


देश में हिन्दी 

हिन्दी में सब कुछ चले, खान, पान और दान ।
यही विज्ञ का धर्म है, रख ले हिन्दी मान ।।

हिन्दी सदा संवारती, करे लोक के काज ।
बिना भाषा लिए, सजे न जग का साज ।।

हिन्दी आगे रख सदा, अपनी भाषा मेल ।
देशज भाषा को बढ़ा, रचती सच्चे खेल ।।

हिन्दीवासी घर करें, हिन्दी के सब काज ।
इसकी रक्षा में कभी, होगा नहीं अकाज ।।

मेल जोल के भाव से, बढ़ता हिन्दी क्षेत्र ।
अहिन्दीभाषी पढ़ें, खोलें अपने नेत्र ।।

बांग्ला, उड़िया, असमी, गुजराती के मोल ।
कन्नड़, तमिल, तेलुगु, दें निज खिड़की खोल ।।

परस्कर संवाद बढ़ा, करतीं कितने काज ।
कविता कथा प्रसंग के, पाकर मनहर राज ।।

पाठशाला हो प्राथमिक, कहीं माध्यमिक जान ।
हिन्दी भाषा सब पढ़ें, देकर उसको मान ।।

महाविद्यालय पढ़ें, सबका हिन्दी प्रेम ।
आकर्षित सबको करें, रखकर अपने नेम ।।

पाठन-पठन सभी करें, जिनको जितनी चाह ।
यही पाठ का धर्म है, सदा बनायें राह ।।

विश्वविद्यालय क्षेत्र में, हिन्दी आदर पाय ।
सबकी सेवा सिद्ध कर, वह सबको हरषाय ।।

हिन्दी में औद्योगिकी, क्या प्रौद्योगिकी हाथ ।
हिन्दी पाठी कुशल हों, पढ़ कौशल के साथ ।।